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ख़तों का सफ़रनामा : अमृता प्रीतम द्वारा बल्गारिया और मॉस्को से इमरोज़ के नाम लिखे गए ख़त

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अमृता ने इमरोज़ को जो पहला ख़त लिखा था, वह सिर्फ एक लाइन का था. वह ख़त इमरोज़ को तब मिला था, जब वह गुरुदत्त के साथ काम करने के लिए दिल्ली छोड़कर मुंबई चले गए थे. उस ख़त में अमृता ने न तो इमरोज़ को किसी नाम से संबोधित किया था और न ही अपना नाम लिखा था. जिस दिन वह ख़त इमरोज़ को मुंबई में मिला, उस दिन उन्हें यह लगा, जैसे अमृता के अस्तित्व का नाम मुंबई भी है. इमरोज़ अमृता को बहुत से नामों से बुलाते थे ‘आशी’ से लेकर ‘बरकते’ तक, कितने ही नामों से. उन्हें जो भी सुन्दर लगता, वह उन्हें उसी नाम से पुकारने लगते. जो भी पसन्द आता, वही नाम रख देते. जब उन्होंने ‘जोरबा-द-ग्रीक’ नॉवल पढ़ा, तब वह उन्हें ‘ज़ोरबी पुकारने लगे. स्पेनिश आर्टिस्ट गोया पर लिखे नॉवल ‘द नेकिड माजा’ को पढ़ने के बाद कितने ही समय तक इमरोज़ अमृता को ‘माजा’ कहकर पुकारते रहे. यह नाम उन्हें बहुत अपना-अपना लगा था. बाद में उन्हें पता लगा कि मराठी भाषा में ‘माझा’ का अर्थ मेरा होता है. शायद इसीलिए उन्हें यह बहुत अपना-अपना लगा.

अपनी विदेश यात्राओं के दौरान अमृता इमरोज़ को बहुत याद करती. चाहे वह समुद्र की लहरें देखते वक़्त हो या फिर हैनरी मिलर की किताब पढ़ते वक़्त. वह चाहती रही कि इमरोज़ उनके साथ हमेशा रहें. जब इमरोज़ उनके साथ नहीं होते, तो उनके साथ इमरोज़ की यादें होतीं. अमृता उन्हीं यादों के साथ सोती, उन्हीं यादों के साथ जागतीं और यादों से बातें करतीं. जब-जब वे एक दूसरे से दूर गए, उन्होंने ख़तों से अपनी मोहब्बत के चिराग़ को जलाए रखा. अमृता को जीने के लिए अपने पाठकों, आलोचकों, या प्रशंसकों की वाह-वाह काफी नहीं थी. उन्हें प्यार चाहिए था, उस शख्स का, जिसे वह अपना रांझा या मिर्जा बना सकती थीं. अमृता इमरोज़ को अपनी ज़िन्दगी की नाव का मल्लाह मानती थीं, लेकिन फिर भी पार उतरना नहीं चाहती थी. वह उनके साथ डूब जाना चाहती थीं और कायनात ने कुछ ऐसा ही कर दिया. अमृता बीमार हो गई, फिर शुरू हो गई तीमारदारी. इमरोज़ ने उन्हें बच्चों की तरह, संभाला, हाथों से खिलाया, हाथों से उठाया. अमृता ने उन्हीं हाथों में दम तोड़ा और एक ख़ुशनसीब रूह ने अपना मुकाम पा लिया.

अपने ख़तों के बारे में अमृता ने लिखा था, “मेरे महबूब, मेरे तसव्वुर, मेरी सारी ज़िन्दगी मुझे ऐसी लगती है, जैसे मैंने तुम्हें एक ख़त लिखा हो. मेरे दिल की हर धड़कन, एक अक्षर है, मेरी हर सांस जैसे कोई यात्रा, हर दिन जैसे कोई वाक्य और सारी ज़िन्दगी जैसे एक ख़त. अगर कभी यह ख़त तुम्हारे पास पहुंच जाता, तो मुझे कभी भी भाषा के शब्दों की मोहताजी न होती.” इसके अतिरिक्त अमृता की कई ऐसी रचनाएं हैं, जो ख़तों की सूरत में हैं, जैसे सुनेहड़े, एक लम्बी कविता है, जो साहिर के ख़त के आने पर शुरू होती है. यह कविता उन्होंने 1953 में लिखी थी और साल 1953 को ही समर्पित कर दी थी. ‘आखिरी ख़त’ अमृता ने साहिर को संबोधित किया, लेकिन उसका नाम नहीं लिखा. यह ख़त उन्होंने 1956 में लिखा था. यह साल अमृता से इमरोज़ की पहचान का पहला साल था. उन दिनों इमरोज़ उर्दू की पत्रिकाओं ‘शमा’ और ‘आईना’ के लिए काम करते थे. जब ‘आख़िरी ख़त’ ‘आईना’ में छपने के लिए आया, तो इमरोज़ ने अमृता से पूछा, “यह ख़त तुमने किसे लिखा है? अगर तुम बताओ, तो मैं उसकी तस्वीर भी बना दूं.”

तब अमृता कुछ कहने से झिझक गई थीं और इमरोज़ ने उस आख़िरी ख़त के साथ कोई एक तस्वीर बना दी. कविता ‘एक खत’ अमृता ने वर्तमान दशा की ओर से धरती के भविष्य के नाम लिखी थी, जो उनके कविता संग्रह काग़ज़ कैनवास में शामिल है. और ‘एक ख़त’ लेख अमृता ने अपने वारिस के नाम लिखा. वह सफ़रनामा किताब में शामिल है. ‘एक ख़त’ ‘लिखतुम तमाम धरती पढ़तुम तमाम लोग’ अमृता ने दुनिया के शासकों और वैज्ञानिकों के नाम लिखी थी. अमृता की कविता ‘अहदनामा’ भी एक ख़त है, जिसमें अमृता ने कहा है ‘अमन का एक अहदनामा, आओ दुनिया वालो, दस्तख़त करो!’ यह ख़त उन्होंने सितंबर 1965 में ताशकंद में हो रहे हिंद-पाक के अहदनामें के अवसर पर लिखा था. ‘एक ख़त’ अमृता ने नवंबर, 1965 में पाकिस्तान के नाम लिखा था. अमृता प्रीतम के सारे ख़त उनकी रचना के हिस्से हैं.

Amrita Imroz Letters

डॉ. उमा त्रिलोक की किताब ‘ख़तों का सफ़रनामा’ में वही ख़त शामिल किए गए हैं, जो सीधे डाक से उन्हें मिले और जो इमरोज़ ने सीधे अमृता को लिखे या फिर अमृता ने इमरोज़ को लिखे.

डॉ. उमा त्रिलोक की किताब ‘ख़तों का सफ़रनामा’ में वही ख़त शामिल किए गए हैं, जो सीधे डाक से भेजे गए, जो इमरोज़ ने अमृता को लिखे या फिर जो अमृता ने इमरोज़ को लिखे. ‘ख़तों का सफ़रनामा’ किताब एक प्रेम कहानी है. प्रस्तुत हैं किताब से अमृता के वे चुनिंदा ख़त जो उन्होंने साल 1966 में बल्गारिया और मॉस्को से इमरोज़ के नाम लिखे-

ख़त- (1)
जीती,
घर से जाने-पहचाने चेहरों से बिछड़कर पहला एहसास अजीब अकेलेपन का हो रहा है.

रात को जैसे ऊपर देखने पर बादल दिखाई दे रहे होते हैं… इस समय हवाई जहाज़ की खिड़की से नीचे देखने पर बादल दिखाई दे रहे हैं… जैसे आसमान को फाड़कर आधा नीचे बिछा लिया हो और आधा ऊपर ओढ़ लिया हो, सिर्फ जिस्म ने नहीं, ख़यालों ने भी.

मॉस्को पहुंचने में अभी दो घंटे की देर है, ख़यालों को अकेलेपन से चलकर कहीं पहुंचने में अभी न जाने कितने घंटे बाकी हैं.

24 जून 1966, दो बजे दोपहर

ख़त- (2)
दोस्त,
सोच रही हूं, यह लंबे सफ़र अगर अकेले करने हों, तो जवानी में ही कर लेने चाहिए, नहीं तो हमें इकट्ठे करना चाहिए. अजीब अकेलेपन का एहसास होता है, अकेले. अच्छा अकेलेपन की लंबी बात नहीं करती, नहीं तो ख़त लिखते-लिखते पॉल पॉट्स बन जाऊंगी.

सोफिया होटल के कमरे में बैठकर यह ख़त लिख रही हूं. जिस होटल में ठहरी हूं, वह नया बना है, बहुत अच्छा है, पर यहां खाने का इंतज़ाम नहीं है. खाना खाने के लिए किसी और होटल में जाना पड़ता है.

सवेरे हवाई जहाज़ में चाय मिली थी, पर आज सारे दिन चाय नहीं मिली. शाम को कई जगहों से पता किया, चाय नहीं मिली. यहां लोग चाय नहीं पीते.

कंदला की बनाई हुई चाय याद आ रही है.

25 जून, 1966

ख़त- (3)
मेरे इमरोज़,
आशिक़ दुनिया के हर मुल्क में होते हैं, पर आज मैं मॉस्को में आशिकों के आशिक़ देख रही हूं. गोर्की, चेखव, टॉल्स्टाय, मायकोव्स्की और कितने ही और कलम के आशिक़ इस देश में हुए.

कलम के, स्वतंत्रता के और मनुष्यता के आशिक़ और देशों में भी होते हैं, पर सोवियत लोगों ने जिस तरह इनकी छोटी-छोटी यादों को भी संजोकर सिर-आंखों पर रखा है, इन्हें आशिकों के आशिकों से कम कुछ नहीं कहा जा सकता.

इनके नामों पर सड़कें, इनके बुत और इनकी तस्वीरें बनाने के अलावा इनकी क़लम द्वारा रचित कृतियां, इनके अंगों से स्पर्श किए हुए कपड़े और इनके हाथों से छुई हुई वस्तुएं, चाहे वह एक चाकू हो, ऐनक हो, कंघी हो, ख़त हो या चाय की केतली और एक प्याला ही हो, लोगों ने चूम-चूमकर रखी हुई हैं.

लोगों की अमीरी उनके खिले हुए चेहरों से हर जगह प्रत्यक्ष दिखाई देती है, पर इन संग्रहालयों में जा खड़े हों, तो लोगों के मन की अमीरी की थाह भी मिलती है.

आज मैं गोर्की के स्मृति भवन में खड़ी, लेनिन की कद्र और दोस्ती के हक़दार लेखक गोर्की की तस्वीरें भी देख रही हूं और बाल-गोर्की के उस घर का नक्शा भी, जहां उसने अपने नाना का प्यार, गरीबी और मार झेली थी, और इसके बीच के समय में घटने वाले हर हादसे के चिन्ह देख रही हूं. वह पहली मेज़ जिस पर कोहनी रखकर गोर्की ने पहली कहानी लिखी, वह अख़बार जिसमें, उसकी पहली कहानी छपी.

1902 में गोर्की के घर के आगे ‘ज़ार’ के लगाए हुए पहरे की तस्वीर और गोली से बिंधा हुआ चमड़े का वह बटुआ, जिसने दिसंबर, 1903 में, जब अचानक ज़ार के आदमी ने गोर्की की छाती में गोली मारी थी, तब उसकी छाती को बचा लिया था और 9 जनवरी, 1905 के उस खूनी इतवार की तस्वीर जब ज़ार की गोली ने मज़दूरों की शान्तिपूर्ण हड़ताल का सामना किया था और गोर्की का वह रोषपूर्ण लेख, जो उसने मजदूरों की सहानुभूति में लिखा था और जिसके बदले में ज़ार ने उसे कैद में डाल दिया था, गोर्की, कैदी नम्बर-68-9-9 और जेल की उस लोहें की चारपाई का नक्शा मेरे सामने है, जिस पर बैठ कर गोर्की की क़लम ने कितना कुछ रचा था.

गोर्की की 25,000 यादों का यह घर और ऐसा ही हर लेखक का संग्रहालय कोई ऐसा मुल्क ही बना सकता है, जहां आशिकों के आशिक़ बसते हों.

अमृता
18 जून 1966

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Author: Gypsy News

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