traffictail

Shivani 100th anniversary: शिवानी की नायिकाएं आफतों को झेलती हैं मगर कभी हार नहीं मानतीं- क्षमा शर्मा

SHARE:

Shivani 100 Birth Anniversary: आज शिवानी होतीं तो सौ वर्ष की होतीं. कहना होगा कि हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारी पीढ़ी ने न केवल शिवानी को खूब पढ़ा, बल्कि उन्हें देखा भी और बोलते हुए सुना भी. सत्तर-अस्सी के दशक में उनकी रचनाओं की धूम चारों ओर थी. उनके उपन्यास ‘कृष्णकली’, ‘स्वयंसिद्धा’, ‘सुरंगमा’, ‘भैरवी’, ‘मायापुरी’ ने प्रसिद्धि के शिखर छुए थे. शिवानी के लेखन का फलक बहुत विस्तृत था. कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, बच्चों के लिए साहित्य सहित उन्होंने बहुत कुछ लिखा.

वह जमाना आंखों के सामने से अभी-अभी गुजरा लगता है, जब शिवानी के किसी उपन्यास की घोषणा उस समय की सबसे अधिक प्रसार संख्या वाली पत्रिका ‘धर्मयुग’ या ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में छपने से होती थी और इन पत्रिकाओं का प्रसार बहुत बढ़ जाता था. यह था शिवानी का जादू. कहते हैं कि उन्होंने बारह वर्ष की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था और जीवन पर्यंत लिखती रहीं. वह कहती भी थीं कि जब तक उनकी उंगलियां चल रही हैं, लिखती रहेंगी. उनका कहना था कि साहित्य चाहे उपन्यास-कहानी ही क्यों न हो, उसमें लेखक का, कवि होने का कौशल भी झांकता है.

शिवानी पर आरोप लगता था कि उनके पात्र अकसर धनाढ्य वर्ग से आते हैं. इस पर लेखिका का कहना था कि उन्होंने इस वर्ग के आभिजात्य के पीछे छिपी उनकी समस्याओं, आफतों, उनके अनेक चेहरों, कुंठाओं, मुसीबतों को बहुत पास से देखा है. इसीलिए उन पर कलम चलाई है. वह यह भी कहती थीं कि उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों, भ्रष्ट्राचार और विसंगतियों को सामने लाना है. चूंकि वह खुद इसी वर्ग से आती थीं, तो इन स्त्रियों और उनके परिवारों को देखने का अवसर भी नजदीक से मिला. उनका ‘कृष्णकली’ उपन्यास जब धारावाहिक छप रहा था, तो उसकी बहुत चर्चा होती थी. एक बार शिवानी ने ‘कृष्णकली’ के बारे में कहा था कि उन्होंने वह उपन्यास जिस पर लिखा था, वह वास्तविक चरित्र था. शिवानी के बारे में कहा जाता था कि उनकी नायिकाएं बेहद सुंदर होती हैं. उनके साहित्य में बदसूरत औरतों की कोई जगह ही नहीं है. इस पर लेखिका का कहना था कि वे कुमाऊं से आती हैं और वहां की स्त्रियां बेहद सुंदर होती हैं.

अहिल्याबाई होलकर- एक रानी, अंग्रेजों ने भी जिनकी खूब तारीफ की है

यहां एक बात कहना जरूरी है कि शिवानी खुद बहुत सुंदर महिला थीं. तीखे नाक-नक्श, गौर वर्ण, लम्बी, पतली. एक बार मैं शिवानी के सम्मान में आयोजित एक कार्यक्रम में गई. शिवानी जब वहां आईं तो उनकी आभा को देखती ही रह गई. जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो इतनी धाराप्रवाह और ओजस्वी कि लगता था कि वह बोलती रहें और हम सुनते रहें. हिंदी में बोल रही थीं मगर बीच-बीच में बांग्ला, संस्कृत, अंगरेजी, गुजराती के उद्धरण भी आ-जा रहे थे. वह इन सभी भाषाओं को धाराप्रवाह बोल सकती थीं. उनके बारे में कहा जाता था कि उनकी हिंदी बहुत संस्कृतनिष्ठ है. उसका कारण उन्होंने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि को बताया था. कई भाषाएं जानते हुए भी उन्होंने लिखने का माध्यम हिंदी को चुना, क्योंकि उनके अनुसार मातृभाषा में लिखना सर्वोपरि होता है.

बेशक उनकी नायिकाएं अपूर्व सौंदर्य की मालकिन होती हैं लेकिन वे साहसी और खुले विचार वाली भी हैं. यहां उनकी नायिकाओं में हमें शिवानी भी झांकती मिलती हैं, जो स्त्री अधिकारों को लेकर बहुत सजग थीं. वे उनकी आजादी, आत्मनिर्भरता और स्वायत्ता की भी प्रबल पक्षधर थीं. शिवानी के पात्र हमारे आसपास के हैं, जीवंत. इसलिए उनमें अच्छाइयां और बुराइयां दोनों हैं. इसलिए वे मुकम्मल मनुष्य भी हैं. उनकी रचनाओं में समाज में फैली तमाम कुरीतियों का विशद वर्णन है. उनकी नायिकाएं बहुत-सी आफतों को झेलती हैं मगर हार नहीं मानतीं. वे संघर्ष करके जिंदगी की बहुत सी समस्याओं को चुनौतियां देती हैं. शिवानी ने बुजुर्गों की समस्याओं पर भी कलम चलाई थी. ‘दो सखियां’ उनकी ऐसी ही कहानी है. इसे वृद्धाश्रम पर लिखा गया है. यहां आने वाली औरतें देश के चाहे किसी भी हिस्से से आई हों, उन सबकी समस्याएं एक जैसी हैं. अपने ही बच्चे कभी हाल नहीं पूछते, न कभी मिलने आते हैं. बेटे हों या बेटियां, सब बूढ़े माता-पिता से दूर भागते हैं.

शिवानी दहेज जैसी कुरीतियों की बहुत विरोधी थीं. उनका विचार था कि जो लड़के वाले यह कहते हैं कि हमें कुछ नहीं चाहिए, वे उनसे ज्यादा खतरनाक होते हैं जो मुंह खोलकर कुछ मांगते हैं. न मांगने वालों की मांगें बढ़ती ही जाती हैं और बहुत बार ऐसे परिवारों में लड़कियां हिंसा का शिकार बनती हैं.

शिवानी धार्मिक होते हुए भी धार्मिक पाखंडों की बहुत विरोधी थीं. वे विधवा विवाह और तलाक की भी प्रबल समर्थक थीं. उनका कहना था कि महिलाएं ही क्यों हमेशा अन्याय सहती रहें.

शिवानी ने लम्बा समय शांतिनिकेन में बिताया था. वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई थी. गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर और पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी की प्रिय शिष्या थीं.

शिवानी अपने वक्त में भारतीय संस्कृति को लेकर बहुत सजग थीं. उन्हें लगता था कि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से कटती जा रही है और यह कोई अच्छी बात नहीं है. इसलिए साहित्य ऐसा हो जो युवाओं को अपनी संस्कृति, अपने समाज से जोड़े रखे. पश्चिम की संस्कृति का जो आक्रमण हमारे ऊपर हो रहा है, उससे कैसे निजात मिले! देखा जाए तो आज यह बात बहुत ही विकट रूप से हमारे सामने है.

एक बार शिवानी ने कहा था कि कई बार यह देखकर अफसोस होता है कि साहित्य के पाठक घटते जा रहे हैं. ऐसे में लेखक के मन में यह बात आती है कि आखिर वह क्यों लिख रहा है. जब पाठक नहीं मिल रहे हैं, या नहीं पढ़ रहे हैं, तो आखिर किसके लिए लिख रहे हैं. यह बात इन दिनों भी हमें बहुत सुनाई देती है कि साहित्य के पाठक नहीं रहे. लेकिन शिवानी को यह क्यों कहना पड़ा, नहीं बता सकती क्योंकि उनके पाठकों की कमी कभी नहीं रही. रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर उनके उपन्यासों के पेपरबैक संस्मरण बहुतायत से मिलते थे. लोग उन्हें खरीदते थे और पूरी यात्रा के दौरान पढ़ते थे.

शिवानी समकालीन लेखकों को भी खूब पढ़ती थीं. महिला लेखन में उनकी विशेष दिलचस्पी थी. वह महिलाओं के लिखे को बहुत पसंद भी करती थीं.

आज शिवानी नहीं हैं लेकिन उनकी रचनाएं हमारे साथ हैं. उनकी स्मृति को नमन.

 Kshama Sharma Writer, Bal Lekhak Kshama Sharma, Kshama Sharma Ki Kahani, Kshama Sharma Books, Kshama Sharma  Novels, Hindi Sahitya News, Literature News,

Tags: Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

Source link

Gypsy News
Author: Gypsy News

Leave a Comment