ट्रेन हादसों में जान-माल का नुकसान कब ज्यादा और कब कम होता है? जानें LHB और ICF कोच में अंतर

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नई दिल्ली. ओडिशा के बालासोर में इसी साल 2 जून को एक भीषण रेल हादसा (Railway Accident) हुआ था. इस हादसे में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी. बालासोर ट्रेन हादसे के चार महीने बाद एक बार फिर से बिहार के बक्‍सर में बीती रात एक बड़ा ट्रेन हादसा हुआ है. दिल्‍ली के आनंद विहार टर्मिनल से चलकर यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल होते हुए कामाख्‍या तक जाने वाली नॉर्थ ईस्‍ट सुपरफास्‍ट ट्रेन (North East Superfast Train Accident) हादसे का शिकार हो गई. इस हादसे में ट्रेन की 21 बोगियां पटरी से उतर गईं. हादसे में अबतक 4-5 यात्रियों की मौत हो चुकी है, वहीं तकरीबन 100 से ज्यादा यात्री घायल बताए जा रहे हैं. रेलवे ने अभी तक इस हादसे के कारणों का खुलासा नहीं किया है, लेकिन लगातार हो रहे ट्रेन हादसों को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि क्या रेलवे में ट्रैक और सिग्नल की सेफ्टी पर शानदार काम होने का दावा खोखला है? रेलवे का सेफ्टी पर ध्यान देने के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में बार-बार ट्रेन हादसे क्यों हो रहे हैं?

पिछले कई सालों से मोदी सरकार रेलवे के यात्रियों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दे रही है. इसी के तहत कोरोना काल के दौरान पटरी से लेकर ट्रेन के कोच तक बदले गए. इसी के तहत ट्रेन में एलएचबी (LHB) कोच लगाए जा रहे हैं. बता दें कि पहले रेलवे आईसीएफ (Integral Coach Factory) डिजाइन वाले कोचों के जरिए ट्रांसपोर्ट किया करती थी, जिसे कई कारणों से अब लगभग हटा ही दिया गया है. भारतीय रेलवे ने वक्त और जरूरत के हिसाब से अपने तकनीक में बदलाव करना शुरू किया. रेलवे में यह बदलाव 1995 के दौर से शुरू हुई थी, जिसे अभी तक जारी रखा गया है. साल 1995 में एक जर्मनी कंपनी से इंडियन रेलवे ने कोच के डिजाइन को लेकर समझौता किया था. इसके बाद से आईसीएफ कोच की जगह नई टेक्नोलॉजी के एलएचबी (Linke Hofmann Busch Coaches) का परिचालन देश में शुरू किया गया.

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बालासोर ट्रेन हादसे के चार महीने बाद बिहार के बक्‍सर में बड़ा ट्रेन हादसा हुआ है.(फाइल फोटो- News18)

कब होता है जान-माल का भारी नुकसान
हाल के दिनों में कुछ बड़े ट्रेन हादसों को लेकर न्यूज 18 हिंदी ने रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन आरएन मल्होत्रा से बात की. आरएन मल्होत्रा ने न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, ‘देखिए ट्रेन हादसा कई कारणों से होता है. इससे डिजाइन, पटरी या कोच के प्रकार का कोई संबंध नहीं होता है. अक्सर पटरी पर जा रही ट्रेन उतर जाती हैं. जब ट्रेन कम स्पीड से हादसे का शिकार होती हैं तो ज्यादा जानमाल का नुकसान नहीं होता है. लेकिन, जब यही ट्रेन स्पीड में रहती है तो कुछ डिब्बे पलट जाती हैं या उलटी हो जाती हैं. देखिए ट्रेन की बॉगियां तब पलटती हैं, जब रेल लाइन ऊंचाई पर बनी होती है या फिर खाई या पुल या पुलिया वहां होती है. पटरी से हटते ही ट्रेन का पहिया दूर चला जाता है तो पलटना स्वाभाविक है. आप कार दुर्घटना में भी देखते हैं कि गाड़ी का पहिया मुड़ने पर वह तीन-चार बार पलट जाती है. ट्रेन में अगर इस तरह का हादसा हुआ है तो इसमें जानमाल का नुकसान ज्यादा होता है. पुल या खाई होने की वजह से भी मौत ज्यादा होती हैं. इसके आलावा अगर दो ट्रेनों में आमने-सामने टक्कर होती हैं तो नुकसान ज्यादा होता है.

क्या कहते हैं रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन
मल्होत्रा आगे कहते हैं, आईसीएफ रेलवे की अपनी फैक्टरी का नाम है, जहां कोचेज बनाई जाती हैं. अभी तक भारत की डिजाइन वाली कोच जो बनती हैं उसे आईसीएफ कहते हैं. यह कपूरथाला और चेन्नई सहित देश के कई हिस्सों में है. वहीं, एलएचबी जर्मनी की कंपनी है. दोनों में फर्क इतना था कि जर्मनी वाली कंपनी का स्प्रींग सिस्टम भारत से बेहतर था. इनकी स्पीड ज्यादा रखी जाती थी. शुरू-शुरू में जब यह तकनीक भारत में आई तो इसमें में भी चलते वक्त या रुकते वक्त ट्रेन में बैठे लोगों को थोड़ा जर्क महसूस होता था. बात में पता चला कि यह झटका कपलिंग की वजह से आता था. दो डिब्बों को जोड़ने के लिए कपलिंग लगाई जाती है. एलएचबी बॉगी में यह कपलिंग रेलवे ने कहीं और से लेकर लगाई थी. इस वजह से झटका लगता था. अब कपलिंग एलएचबी की ही लगाई जा रही है तो जर्क नहीं होता है.’

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नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस हादसे के बाद रेलवे ने कई ट्रेनें कैंसिल की हैं.

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कुल मिलाकर बात करें तो ट्रेन दुर्घटनाओं में एलएचबी कोचेज और आईसीएफ कोचों को कोई लेना-देना नहीं होता है. आईसीएफ डिजाइन वाले कोच में कई सारी कमियां आने लगी थीं, ये कमियां भारतीय रेलवे की तरक्की में बहुत बड़ी बाधा साबित हो रहीं थीं. इसी को ध्यान में रखते हए अब एलएचबी कोचेज लगाए जा रहे हैं. आईसीएफ कोचेज में कम गति, जंग, खराब राइडिंग कम्फर्ट, अंडर गियर पुर्जो की अधिक घिसाव और भी कई तरह के कारण थे. जबकि, एलएचबी कम वजन, बड़ी और चौड़ी खिड़कियां, भरोसे लायक, तेज गति वाली रेल, बेहतर यात्री सुविधा और मरम्मत पर कम खर्चा लगता था.

Tags: Buxar news, Indian Railways, Odisha Train Accident, Train accident

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