क्यों आता है भूकंप, क्या हल्के झटके बड़े का संकेत तो नहीं, एक साइंटिस्ट पहले ही कर दिया था इशारा

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हाइलाइट्स

नेपाल से लेकर समूचे उत्तर भारत में 6.2 तीव्रता के झटके महसूस किए गए
ये इस साल उत्तर भारत में महसूस किया गया है 05वां बड़ा झटका

समूचे उत्तर भारत में करीब 6.2 भूकंप के तेज झटके महसूस किये गए. भवन हिलने लगे. बहुमंजिला भवनों में हड़कंप मच गया. घबराए लोग बड़ी संख्या में नीचे उतर आए. भूकंप की जद नेपाल से शुरू होकर समूचे उत्तर भारत में रही. ये भूकंप दूसरे झटकों से अलग कुछ ज्यादा देर रहा. ये भूकंप इस साल आए मध्यम तीव्रता के झटकों में पांचवां बड़ा अर्थक्वेक था. इसके बाद कई सवाल भी खड़े हो गए हैं कि ये हल्का भूकंप किसी बड़े भूकंप का इशारा तो नहीं. हालांकि ये भी सवाल है कि उत्तर भारत में भूकंप के झटके पहले की तुलना में क्या बढ़ गए हैं. गौरतलब ये भी है कि मुश्किल कुछ घंटे पहले ही नार्थईस्ट खासकर मेघालय में भूकंप के झटके महसूस किए गए थे.

एक साइंटिस्ट फ्रेंक हूगरबीट ने दावा किया था कि 03 अक्टूबर को भूकंप आ सकता है. उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, 30 सितंबर हमने पाकिस्तान के करीब कुछ इलाकों में वातावरण में विचलन रिकॉर्ड किए थे. ये चीज इस बात का संकेत थी कि कोई तगड़ा भूकंप आसपास आ सकता है. ऐसा ही मोरक्को में भी हुआ था. लेकिन हमें पुख्ता तौर पर नहीं मालूम था कि ऐसा होगा ही.

एक साइंटिस्ट ने ट्विटर पर दावा किया है कि उन्हें कई दिन पहले इस भूकंप का संकेत मिल गया था. (courtesy X)

जब ऐसा होता है तो इससे पहले क्या कोई संकेत वातावरण में भी मिलता है, इस बात का जवाब फिलहाल वैज्ञानिकों के पास नहीं है लेकिन वो इस पर काम जरूर कर रहे हैं.

क्या मानी जाती है भूकंप की असल वजह

दरअसल धरती के भीतर कई प्लेटें होती हैं जो समय-समय पर विस्थापित होती हैं. इस सिद्धांत को अंग्रेजी में प्लेट टैक्टॉनिकक और हिंदी में प्लेट विवर्तनिकी कहते हैं. इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी की ऊपरी परत लगभग 80 से 100 किलोमीटर मोटी होती है जिसे स्थल मंडल कहते हैं. पृथ्वी के इस भाग में कई टुकड़ों में टूटी हुई प्लेटें होती हैं जो तैरती रहती हैं.

सामान्य रूप से यह प्लेटें 10-40 मिलिमीटर प्रति वर्ष की गति से गतिशील रहती हैं. हालांकि इनमें कुछ की गति 160 मिलिमीटर प्रति वर्ष भी होती है. भूकंप की तीव्रता मापने के लिए रिक्टर स्केल का पैमाना इस्तेमाल किया जाता है. इसे रिक्टर मैग्नीट्यूड टेस्ट स्केल कहा जाता है. भूकंप की तरंगों को रिक्टर स्केल 1 से 9 तक के आधार पर मापा जाता है.

वैसे वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी हुई थी कि हिमालय क्षेत्र में एक बड़ा भूकंप आने का खतरा मंडरा रहा है, जो काफी बड़े इलाके पर असर डाल सकता है. आईआईटी कानपुर के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसरों ने भी भविष्य में एक बड़े भूकंप के आने की आशंका जताई थी. उनका कहना है कि धरती के नीचे भारतीय प्लेट व यूरेशियन प्लेट के बीच टकराव बढ़ रहा है.

हिमालय क्षेत्र में बन रही है भूगर्भीय ऊर्जा
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून के वैज्ञानिकों के मुताबिक, हिंदुकुश पर्वत से पूर्वोत्तर भारत तक का हिमालयी क्षेत्र भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील है.मौजूदा भूकंप का केंद्र भी हिंदूकुश के ही इलाके को बताया जा रहा है. वैसे एक्सपर्ट्स का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में भूगर्भीय ऊर्जा और नए भूस्खलन जोन बन रहे हैं, जो भूकंप की आहट देते हैं.

आईआईटी कानपुर के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसरों ने भी भविष्य में एक बड़े भूकंप के आने की आशंका जताई है.

दुनियाभर में रोज औसतन 55 भूकंप आते हैं
भूकंप पर नजर रखने वाली अमेरिकी साइट यूएसजीएस के मुताबिक 13 नवंबर से लेकर 14 नवंबर के शुरुआती घंटों तक करीब 44 भूकंप दुनियाभर में आए. जिसमें सबसे ज्यादा तीव्रता का भूकंप 6.1 जापान के आसपास था. वैसे जापान और फिजी के आसपास के इलाकों में भूकंप खूब आते हैं.

ये अमेरिकन साइट बताती है कि दुनियाभर में रोज तकरीबन 55 भूकंप आते हैं लेकिन इनमें से ज्यादा हल्के ही होते हैं. जिनकी तीव्रता 5.0 के आसपास होती है. रोज 03 से 04 भूकंप 6 से ज्यादा तीव्रता के भी होते हैं.

कामकैट अर्थक्वेक कैटेलॉग कहता है कि हाल के बरसों में भूकंप की संख्या बढ़ी है, इसकी वजह ये भी है कि दुनियाभर में भूकंप को आंकने के संवेदनशील उपकरण बढ़ रहे हैं और वो कहीं ज्यादा समय से भूकंप को आंक रहे हैं, लिहाजा इनकी संख्या बढ़ रही है.

हर साल 20,000 झटकों की गणना होती है
अमेरिका का द नेशनल अर्थक्वेक इंफार्मेशन सेंटर पूरी दुनिया में हर साल 20,000 भूकंप की गणना कर रहा है. भूकंप के रिकॉर्ड वर्ष 1900 से अपडेट किये जा रहे हैं, वो ये बताते हैं कि हर साल दुनियाभर में औसतन 16 बड़े भूकंप आते हैं. इसमें 15 ऐसे होते हैं जो रिक्टर स्केल पर 07 तीव्रता के होते हैं तो एक 08 या उससे तीव्रता का.

पिछले 40 साल के रिकॉर्ड ये भी बताते हैं कि ज्यादा देर तक टिकने वाले भूकंप बढ़े हैं. वर्ष 2010 में 23 बड़े भूकंप आए.

जरूरी नहीं कि छोटे झटकों के बाद बड़ा भूकंप आए
अमेरिका में वर्ष 2020 में जनवरी में एक के बाद एक आए दो भूकंप के झटकों के बाद के बर्कले की भूकंप विज्ञान प्रयोगशाला (Seismology Lab) की ओर से कहा गया था, ‘इस तरह के छोटे-छोटे झटकों के आधार पर पुख्‍ता तौर पर ये नहीं कहा जा सकता है कि कोई बड़ा झटका आने वाला है. अब तक ऐसे छोटे-छोटे झटकों की श्रृंखलाओं के बाद किसी बड़े झटके का कोई प्रमाणिक उदाहरण नहीं मिलता है.’

छोटे झटके फॉल्ट लाइन प्रेशर से भी आते हैं
वैसे प्रयोगशाला ने ये भी कहा था कि अगर भूकंप के ये छोटे-छोटे झटके किसी फॉल्‍ट-लाइन प्रेशर के कारण आ रहे हैं तो ये बड़े झटके की दस्‍तक माने जा सकते हैं. बता दें कि पूरी धरती पर कई फॉल्ट जोन हैं. इसका मतलब है क‍ि धरती पर कई जगह प्लेट्स एक-दूसरे से मिलती हैं. इन प्‍लेटों के आगे-पीछे या ऊपर-नीचे खिसकने पर भूकंप आता है. भारत को भूकंप के जोखिम के हिसाब से चार जोन में बांटा गया है. भू-वैज्ञानिकों ने दिल्ली और इसके आसपास के इलाके को जोन-4 में रखा है यानी यहां 7.9 तीव्रता तक का भूकंप आ सकता है.

भू-वैज्ञानिकों ने दिल्ली और इसके आसपास के इलाके को जोन-4 में रखा है यानी यहां 7.9 तीव्रता तक का भूकंप आ सकता है.

क्या होती है फॉल्ट लाइन
बता दें कि टेक्‍टोनिक प्‍लेट्स (Tectonic Plates) के जुड़ने वाली जगह को फॉल्‍ट लाइन कहा जाता है. प्लेट्स जहां-जहां जुड़ी होती हैं, वहां-वहां टकराव ज्यादा होता है और उन्हीं इलाकों में भूकंप ज्यादा आता है.

बर्केले की भूकंप विज्ञान प्रयोगशाला के अध्‍ययनों की मानें तो छोटे झटकों के बाद बड़े झटके के बारे में स्‍पष्‍ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. अगर ये फॉल्‍ट लाइन प्रेशर की वजह से हैं तो कभी भी बड़ा झटका आ सकता है और सामान्‍य एडजस्‍टमेंट की स्थिति में लंबे समय तक ऐसी कोई घटना नहीं होगी. वहीं, वैज्ञानिक एक और थ्‍योरी पर भी बात करते हैं. उनका मानना है कि ये छोटे झटके फॉल्‍ट लाइन प्रेशर को कम करने के लिए आ सकते हैं.

क्या हल्के झटके बड़े भूकंप की आशंका को खत्म करते हैं
इससे भूकंप के बड़े झटके आने की आशंका घट जाती है. हालांकि, कुछ वैज्ञानिक इसे सिर्फ भ्रम मानते हैं. अमेरिका के भू-विज्ञानी बर्गमैन के मुताबिक, हो सकता है कि ये बड़े भूकंप से पहले आने वाले छोटे झटके हों. ऐसे ही झटके बड़े झटकों के बाद भी महसूस किए जाते हैं. हालांकि, वह कहते हैं कि इस बारे कोई भी अनुमान लगाना नामुमकिन है.

हल्‍के झटकों के बाद हफ्तेभर के अंदर उनसे थोड़ी ज्‍यादा तीव्रता के भूकंप की 10 फीसदी आशंका बनी रहती है.

हल्‍के झटकों के बाद हफ्ते भर में भूकंप की होती है आशंका
बर्गमैन कहते हैं कि भूकंप के हल्‍के झटके बड़े झटके के बाद के हालात से निपटने की तैयारी कर लेने का संकेत देते हैं. हल्‍के झटकों के बाद हफ्तेभर के अंदर उनसे थोड़ी ज्‍यादा तीव्रता के भूकंप की 10 फीसदी आशंका बनी रहती है. इन छोटे झटकों से घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन इनके बाद आपको अलर्ट हो जाना चाहिए.

भूकंप आने का कारण जानने के लिए धरती की बनावट को समझना जरूरी है. धरती की बनावट को चार हिस्सों इनर कोर, आउटर कोर, मेटल और क्रस्ट में बांटा जा गया है. इसमें क्रस्ट धरती की सबसे ऊपरी परत होती है, जो आंखों से दिखाई देती है. नदियां, समंदर, पर्वत, पहाड़, पठार सब इसी क्रस्ट का हिस्सा हैं. समंदर के नीचे की जमीन भी इसी क्रस्ट का हिस्सा है.

आखिर क्‍यों आते हैं भारतीय उपमहाद्वीप में विनाशकारी भूकंप
प्लेट टेक्टॉनिक थ्योरी के मुताबिक, इस क्रस्ट में मौजूद प्लेट्स आपस में जुड़ी होती हैं. इन्‍हीं को टेक्टॉनिक प्लेट्स कहा जाता है. संख्या में ये एक दर्जन से ज्यादा हैं. टेक्‍टोनिक प्‍लेट्स हिलती-डुलती रहती हैं. अगर ये थोड़ा बहुत हिलती हैं तो किसी को पता भी नहीं चलता है, लेकिन अगर ये ज्यादा हिलती हैं तो भूकंप आता है. प्लेट्स के जुड़ने की जगह पर टकराव ज्यादा होता है और उन्हीं इलाकों में भूकंप भी ज्यादा आता है.

ये प्लेट्स आमने-सामने तो कभी ऊपर-नीचे टकराती हैं. कभी-कभी ये प्‍लेट्स आड़ी-तिरछी भी टकरा जाती हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में विनाशकारी भूकंप आते रहे हैं. गुजरात के कच्छ में 2001 में आए भूकंप में हजारों लोगों की जान गई थी. भारत साल करीब 47 मिमी खिसक रहा है. टेक्टॉनिक प्लेट्स में टक्कर के कारण ही भारतीय उपमहाद्वीप में अकसर भूकंप आते हैं. हालांकि, भूजल में कमी से टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति धीमी हुई है.

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