देखा है मैंने तुम्हें आज अभी, सोचा है देखूंगा फिर क्या कभी : त्रिलोचन

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कवि त्रिलोचन हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर होने के साथ-साथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवियों में बेहद ख़ास स्थान रखते हैं. वे आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के उन तीन स्तंभों में से एक हैं, जिसके अन्य दो स्तंभ ‘नागार्जुन’ व ‘शमशेर बहादुर सिंह’ हैं. प्रेम, प्रकृति, जीवन-सौंदर्य, जीवन-संघर्ष और मनुष्यता के विविध आयामों को समेटे हुए त्रिलोचन की कविताओं का आकाश बहुत दूर तक फैला हुआ है. लोक जीवन के प्रति आत्मीय लगाव और हिंदी भाषा की जातीय संघर्षशील चेतना की जड़ों को उन्होंने आधुनिक संवेदना और रचनात्मक संयम के साथ सींचने का काम किया. उनके रचना संसार में सिर्फ कविताएं ही नहीं बल्कि गीत, ग़ज़ल, रुबाई, बरवै के साथ-साथ सॉनेट भी शामिल हैं.

त्रिलोचन का पहला काव्य-संग्रह ‘धरती’ 1945 में प्रकाशित हुआ था. इस संग्रह की कविताओं में भाव-बोध की उदात्तता और पीड़ा-दर्द की अनुभूति एक साथ पढ़ने को मिलती है. ‘धरती’, ‘गुलाब’ और ‘बुलबुल’ के बाद त्रिलोचन का महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह है ‘दिगंत’, जिसका प्रकाशन 1957 में हुआ था. ‘दिंगत’, ‘शब्द’, ‘फूल नाम है एक’, ‘उस जनपद का कवि हूं’ और ‘अनकही भी कुछ कहनी है’ उनके सॉनेट संग्रह हैं, इसके अलावा ‘तुम्हें सौंपता हूं’ और ‘ताप के ताए हुए दिन’ में भी कुछ सॉनेट संकलित हैं. गौरलतब है कि सॉनेट तार वाद्य पर गाई जाने वाली गेय काव्य रचना है, जो पश्चिम से आई है. इटली में इसे ‘सॉनेटो’ कहा जाता है.

ग्रामीण जीवन की विषमताओं के साथ रहना त्रिलोचन ने बचपन में ही सीख लिया था. किशोरावस्था में ही स्कूल से उनका नाता टूट गया. दर-दर की ठोकरें खाते, परिवार से टूटकर दूर रहते हुए किसी तरह जीवन-यापन हेतु पत्रकारिता करने वाले त्रिलोचन काव्य को ही अपना परम कर्म मानते थे. वह अध्ययनशील प्रवृत्ति के थे, जिसके चलते उनका अधिकांश समय पुस्तकालयों में ही गुज़रता था. त्रिलोचन को पहली मान्यता स्थापित आलोचकों से नहीं, पाठकों से मिली. जैसेकि मृत्यु के बाद ही सही, मुक्तिबोध को मिली. लोगों और पाठकों के दबाव ने ही आलोचकों की आंखें उनकी ओर घुमाईं, तब जाकर आलोचकों के लिए वे ‘खोज के कवि’ के रूप में ही सही पर उभर कर आ सके.

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त्रिलोचन हिंदी साहित्य का सौभाग्य हैं. वह बेखबर नहीं, हमेशा बाखबर रहे. त्रिलोचन को 1989-90 में हिंदी अकादेमी ने ‘शलाका पुरस्कार’ से सम्मानित किया. हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हे ‘शास्त्री’ और ‘साहित्य रत्न’ जैसी उपाधियों से समादृत किया गया. वर्ष 1982 में ‘ताप के ताए हुए दिन’ के लिए वह साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित हुए. इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी समिति पुरस्कार, हिंदी संस्थान सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र राष्ट्रीय पुरस्कार, सुलभ साहित्य अकादमी सम्मान और भारतीय भाषा परिषद सम्मान से भी सम्मानित किया गया था.

त्रिलोचन दुख में अपने को रिड्यूस नहीं करते है, बल्कि अपराजेय रहकर निरंतर उदात्तता की ओर ले जाते हैं. इस अर्थ में उनका काव्य-व्यक्तित्व व्यापकता के साथ-साथ ऊर्ध्वगामी भी है. इसीलिए उन्हें ‘हिंदी के महाप्राण कवियों की परंपरा में उन्नत प्राण कवि’ कहा गया है. त्रिलोचन अपने काव्य में दुख के साथ-साथ कर्म और श्रम के महत्व को भी रेखांकित करते चलते हैं. उनके प्रेम में रोना-धोना नहीं है, बल्कि मुक्ति की चेतना है. उनके काव्य में गहरे दुख की छाया है, लेकिन उसमें दुख का प्रदर्शन नहीं है और दुख की घोषणा तो दूर-दूर तक नहीं.

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प्रस्तुत हैं त्रिलोचन की चुनिंदा कविताएं, जिन्हें ‘त्रिलोचन रचना-संचयन’ संग्रह से लिया गया है. इस संग्रह का संपादन और चयन गोबिंद प्रसाद ने किया है और प्रकाशन साहित्य अकादेमी ने. 1955 में जन्मे गोबिंद प्रसाद की हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और पेंटिंग्स में गहरी दिलचस्पी है. उन्हें 2017-18 में हिंदी अकादेमी के साहित्य सम्मान से भी पुरस्कृत किया जा चुका है. प्रसाद जी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. इनके प्रकाशित कविता-संग्रह ‘कोई ऐसा शब्द’, ‘मैं नहीं था लिखते समय’, ‘वर्तमान की धूल’ और ‘यह तीसरा पहर था’ हैं. साथ ही इन्होंने ‘मलयज की डायरी’, ‘केदारनाथ सिंह की पचास कविताएं’ और ‘त्रिलोचन रचनावली’ का संपादन भी किया है. प्रसाद जी चिंतनधर्मी गद्य पुस्तकों के अतिरिक्त फ़िराक गोरखपुरी कृत उर्दू की ‘इश्किया शायरी’ और शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी की कृति ‘उर्दू का इब्तिदाई ज़माना’ का हिंदी अनुवाद और फ़ारसी-हिंदी कोश एवं फ़ारसी-हिंदी-अंग्रेज़ी-उर्दू कोश के संपादन में भी संलग्न रहे हैं.

1)
तारे चुपचाप देखा करते हैं
पवन
शाम बीतने पर
बंसवारी में
छिपकर आता है
बांसुरी बजाता है
रुक-रुककर
बांसुरी बजाता है

नीम के फूलों की
हरी-भरी सुगंध पिए
रात
मौन रहती है
बांसुरी की सुना करती है

तारे चुपचाप देखा करते हैं
पृथ्वी को
राहें उदास देखती हैं
आकाश को!

2)
देखूंगा फिर क्या कभी
देखा है मैंने तुम्हें आज अभी
सोचा है
देखूंगा फिर क्या कभी
किसी दिन
ऐसे ऋण
नयन कहां पाते हैं
कंठ प्यास से
व्याकुल गाते हैं
उषा एक ही क्षण
के लिए हंसी
प्राणों में जैसे
वह हंसी बसी
मन का अवसाद चला गया सभी

3)
अपना-अपना संधान
मैंने जो प्रेमगान गाया था
वह केवल मेरा था
तुमने जो प्रेमगान सुना था
वह केवल तुम्हारा था
मैं तुम दोनों ही
अपना संधान कर रहे थे.

प्रेम व्यक्ति व्यक्ति से
समाज को पकड़ता है
जैसे फूल खिलता है
उस का पराग किसी और जगह पड़ता है
फूलों की दुनिा बन जाती है

प्रेम में अकेले भी हम
अकेले नहीं हैं
मेला क्या हमारा ही मेला है
और मेले नहीं हैं.

4)
सब्ज़ी वाली बुढ़िया
मेथी और पालक की
दो-दो हरी गट्ठियां
लस्सन और प्याज़ की
चार-चार पेटियां
बुढ़िया कह रही थी
ग्राहक से-
ले लो
यह सब
ले लो
कुल पचास पैसे में

ग्राहक बोला-
जो कुछ लेना था
ले चुका
यह सब क्या करूंगा
रखने की चीज़ नहीं

बुढ़िया ने सांस ली
और कहा-
दिन हैं ये ठंड के
ले लो
तो मैं भी घर को जाऊं
ग्राहक ने सुना नहीं
और दाम चुकाकर
चला गया

मैं पास वाले से
गोभी ले रहा था

बुढ़िया से मैंने कहा-
अम्मा सारी चीज़ें
इकट्ठे बांध कर
मुझको दे दीजिए

बुढ़िया असीसती हुई
चली गई
मुझको मालूम नहीं
वह बुढ़िया कौन है
और कहां रहती है
उसके आगे-पीछे
कोई और है कि नहीं

लेकिन उसकी बातें
जो कानों में पड़ीं
उनको अनसुना
कर नहीं पाया मैं

5)
तुम्हें जब मैंने देखा
पहले-पहल तुम्हें जब मैंने देखा
सोचा था
इससे पहले ही
सबसे पहले
क्यों न तुम्हीं को देखा

अब तक
दृष्टि खोजती क्या था
कौन रूप क्या रंग
देखने को उड़ती थी
ज्योति-पंख पर
तुम्ही बताओ
मेरे सुंदर
अहे चराचर सुंदरता की सीमा रेखा.

6)
विपर्याय
मैंने कब कहा था
कविता की सांस मेरी सांस है
जानता हूं मेरी सांस टूटेगी
और यह दुनिया
जिसे दिन-रात चाहता हूं
एक दिन छूटेगी

मैंने कब कहा था
कविता की चाल मेरी चाल है
जानता हूं मेरी चाल रुकेगी
और यह राह
जिसे दिन-रात देखता हूं
एक दिन चुकेगी

मैंने कब कहा था
कविता की प्यास मेरी प्यास है
जानता हूं मेरी प्यास तड़पेगी
और यह तड़प
जिसे दिन-रात जानता हूं
और-और भड़केगी

7)
जीने की कला
भूख और प्यास
आदमी से वह सब कराती है
जिसे संस्कृति कहा जाता है

लिखना, पढ़ना, पहनना, ओढ़ना
मिलना, झगड़ना, चित्र बनाना, मूर्ति रचना
पशु पालना और उनसे काम लेना यही सारे
काम तो इतिहास हैं मनुष्य के सात द्वीपों और
नौ खंडों में.

आदमी जहां रहता है उसे देश कहता है
सारी पृथ्वी बंट गई है अनगिनत देशों में
ये देश अनेक देशों का गुट बनाकर अन्य गुटों से अकसर
मार-काट करते हैं.

आदमी को गौर से देखो
उसे सारी कलाएं, विज्ञान तो आते हैं
जीने की कला उसे नहीं आती

8)
बबूल
अपने आप उगता है
बढ़ता है, मानव का हितैषी है
नाना प्रकार से बबूल

बबूल किसी की शुश्रूषा का
मुहताज नहीं
उंटहार कांटे अलग कर इसकी पत्तियां
हाथ में लेकर ऊंट के मुंह में
डालता है जैसे मां अपने बच्चे
के मुंह में छोटे-छोटे कौर डालती है

बबूल का निर्यास उसके भीतर से
निकलकर बाहर चिपकता रहता है
आयुर्वेद की कई औषधियों में
इसका उपयोग किया जाता है
बबूल की फलियों को सेंगरी कहते हैं
सेंगरी से कई स्वाद के अचार
बनते हैं.

संग्रह : ‘त्रिलोचन रचना-संचयन’
प्रकाशक : साहित्य अकादेमी
संपादक : गोबिंद प्रसाद
पृष्ठ : 318
मूल्य : 300 रुपए

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