यह कहानी है भारतीय सेना के महावीर लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह की. यह बात उस वक्त की है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 की जंग के बादल बिल्कुल फटने को तैयार थे. ऐसे में भारतीय सेना ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कुछ महत्वपूर्ण सामरिक इलाकों में अपनी पैठ मजबूत करने का फैसला किया. इसी फैसले में एक था हिली पर भारतीय सेना का पूरी तरह से कब्जा, जिससे पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) में मौजूद पाकिस्तानी सेना को दो हिस्सों में बांट कर उसकी शक्ति को आधी कर दी जाए.
हिली पर भारतीय परचम लहराने की जिम्मेदारी मिली ब्रिगेड ऑफ गार्ड्स के लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह को. आदेश मिलने के साथ लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह अपनी बटालियन के साथ हिली की ओर कूच कर गए. वहीं, हिली की सामरिक महत्ता समझते हुए पाकिस्तानी सेना ने इलाके की हर एक इंच जमीन की किलेबंदी कर दी थी. पाकिस्तानी सेना की पूरी रणनीति समझने के बाद लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह ने यह निर्णय लिया कि वह अपना पहला हमला ब्रिगेड की बजाय, 800 जांबाजों की बटालियन के साथ करेंगे.
22 और 23 नवंबर की भारतीय सेना ने हिली पर अपनी निर्णायक चढ़ाई शुरू कर दी थी. हालांकि अभी तक भारत और पाकिस्तान के युद्ध की आधिकारिक शुरूआत नही हुई थी, पर 1971 में भारत और पाकिस्तानी सेना के बीच लड़ी गई यह पहली और सबसे बड़ी खूनी लड़ाई जरूर थी. भारतीय सेना ने अपना पहला हमला हिली के नोआपाड़ा इलाके में किया. पाकिस्तानी सेना ने इस इलाके की घेराबंदी के लिए पूरी बिग्रेड तैनात कर रखी थी. वहीं लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह महज 800 जवानों के साथ उनके सामने थे.
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यह एक असंभव सी दिखने वाली लड़ाई थी. भारतीय सेना दुश्मन के मुकाबले कमजोर तो थी ही, साथ ही उसके पास मदद के नाम पर सिर्फ आर्टलरी सपोर्ट था. दलदली इलाका होने के चलते भारतीय सेना के पास एक भी टैंक मौजूद नहीं था. बावजूद इसके, भारतीय सेना ने अपनी हिम्मत नहीं हारी और कमर तक गहरे पानी के बीच अपना रास्ता बनाते हुए दुश्मन की तरफ बढ़ चले. इसी बीच, दुश्मन की निगाह भारतीय सैनिकों पर पड़ गई, जिसके बाद गोलियों और आर्टलरी फायर की बरसात भारतीय जांबाजों पर शुरू हो गई.
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भारतीय जांबाजों ने बिना हिम्मत खोए, दुश्मन से लोहा लेना शुरू कर दिया. देखते ही देखते यह लड़ाई इस युद्ध की सबसे बड़ी खूनी जंग में तब्दील होती चली गई. आलम यहां तक पहुंच गए कि भारतीय सेना के पास लड़ने के लिए गोलियां और हथियार कम पड़ गए. लेकिन उनकी हिम्मत और बहादुरी ने असंभव को संभव कर दिखाया. 22-23 नवंबर की रात शुरू हुई यह खूनी लड़ाई 11 दिसंबर तक चली. 20 दिन चली लड़ाई में भारतीय सेना के 68 रणबाकुरों ने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया.
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इस खूनी लड़ाई में भारतीय सेना के 168 जवान गंभीर रूप से जख्मी हो गए, लेकिन उन्होंने अपनी बहादुरी से पाकिस्तानी की पूरी बिग्रेड को या तो मौत की नींद सुला दिया या फिर दुश्मन को पीठ दिखाकर भागने में मजबूर कर दिया. लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह के नेतृत्व में लगभग 20 दिनों तक चली हिली की खूनी लड़ाई में भारतीय सेना के हर जवान ने असाधारण साहस का उदाहरण पेश किया. तमाम कुर्बानियों के बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह ने 11 दिसंबर की रात तक नोआपाड़ा, मोरापारा, चांदीपुर, हकीमपुर, हाई स्कूल और डांगापारा पर भारतीय परचम लहरा दिया था.
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FIRST PUBLISHED : December 12, 2023, 06:31 IST





