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‘रंग विदूषक’ से अपनी अलग शैली का निर्माण किया बंसी कौल ने- देवेन्द्र राज अंकुर

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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के कलानिधि प्रभाग द्वारा बंसी कौल की पुस्तक ‘रंग विदूषक: ए मास्क विदाउट ए मास्क’ का लोकार्पण समवेत ऑडिटोरियम में किया गया.पुस्तक का संपादन एलन ट्वीडी ने और संकलन अंजना पुरी ने किया है. पुस्तक चर्चा में आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, थिएटर संगीत विशेषज्ञ डॉ. अंजना पुरी, प्रसिद्ध कोरियोग्राफर भारत शर्मा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के पूर्व निदेशक देवेन्द्र राज अंकुर, आईजीएनसीए के कलानिधि प्रभाग के अध्यक्ष डॉ. रमेश गौड़ और रंगमंच निदेशक रमा पांडे उपस्थित थीं.

इस अवसर पर डॉ. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा कि बंशी कौल की किताब दर्शकों को थियेटर से जोड़ने का काम करेगी. उन्होंने कहा कि बंशी कौल को कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2014 में भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया था. उनका जन्म जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में 23 अगस्त 1949 को हुआ. उनका देहावसान 6 फरवरी, 2021 को दिल्ली में हुआ.

बंसी कौल की पत्नी डॉ. अंजना पुरी ने किताब के हर अध्याय के बारे में बताया और कहा कि आने वाले दिनों में इस किताब का हिंदी संस्करण भी आएगा.

प्रसिद्ध रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर ने कहा कि उन्होंने और बंसी कौल ने एक साथ पढ़ाई की थी. बंसी कौल की रंगमंच में यायावरी प्रवृति रही. उन्होंने देश में घूम-घूम कर नाट्य निर्देशन किया और प्रशिक्षण दिया. बंसी कौल राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक हुए और वहीं रेपर्टरी में निर्देशक के तौर पर अपने करियर का आगाज़ किया.

देवेंद्र राज अंकुर ने कहा कि बंसी कौल ने 1984 में ‘रंग विदूषक’ नाम से अपना थियेटर ग्रुप शुरू किया, जिसने अपनी एक अलग विदूषक शैली का निर्माण किया. इस समूह ने हिंदी, तमिल, संस्कृत और सिंहली समेत कई भाषाओं में भारत और भारत के बाहर अपनी प्रस्तुति दी हैं. इसके साथ ही यह शैली विश्व भर में भी चर्चित हो गयी.

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि 1985 में बंसी कौल ने ‘रंग विदूषक’ से संभवत पहला नाटक दिल्ली के प्रगति मैदान में किया था, जिसके दो शो हुए थे. डॉ. जोशी ने बताया कि इस नाटक में उन्होंने भी अभिनय किया था.

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि रंग विदूषक का उनकी जिंदगी में बड़ा योगदान रहा है. उसी दौरान उन्होंने बच्चों के लिए भी एक नाटक किया था ‘रंग बिरंगे जूते’. उसमें एक प्रमुख कलाकार थे टिकक्म जोशी, जो इस समय मध्य प्रदेश ड्रामा स्कूल के डायरेक्टर हैं. डॉ. जोशी ने बंसी कौल को याद करते हुए कहा कि वह जल्दी संतुष्ट नहीं होते थे. वह संस्कृति में अनुशासन रखना चाहते थे. उनके दिमाग में कुछ नया करने को लेकर कुछ न कुछ चलता रहता था. बंसी कौल रंगमंच के शोमैन थे. ‘रंग विदूषक’ में जो भी कलाकार थे, उनका वह बहुत ख्याल रखते थे. युवा पीढ़ी भी रंगमंच पर आए, इसके लिए वह शिद्दत से काम करते थे.

रमा पांडे ने कहा कि उन्होंने बंसी कौल के बनाए हुए नाटकों को देखा है और बहुत कुछ सीखा है. बंसी कौल हिन्दी भाषी थे. यह किताब विचारों का संग्रह है. रमा पांडे ने कहा कि बंसी कौल के अंदर थियेटर की एक लौ थी, इसीलिए वह दिल्ली एनएसडी आए थे.

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प्रसिद्ध कोरियोग्राफर भरत शर्मा ने कहा कि उन्होंने बंसी कौल के साथ बहुत सारे काम किए हैं. उनके अंदर डांसर को देखा. वह थियेटर के गुरु थे. बंसी कौल और उनके थिएटर ग्रुप ‘रंग विदूषक’, इन दो नामों के बिना हिंदी रंगमंच की बात पूरी नहीं होती. सिर्फ देशभर में ही नहीं, पूरी दुनिया में बंसी कौल की पहचान अनूठे रंगकर्मी के रूप में तो है ही, डिजाइनिंग की दुनिया में भी उनका नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है. डिजाइन के वो मास्‍टर थे, फिर चाहे वो थिएटर हो या कोई वृहद आयोजन.

Tags: Hindi Literature, Literature and Art

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Gypsy News
Author: Gypsy News

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