प्रभात पाण्डेय पत्रकारिता के साथ-साथ कविताएं लिखने का शौक है. कविता संग्रह ‘आग और पानी’ में प्रभात की कई कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं. प्रभात मंचों पर भी काव्यपाठ करते हैं. उनकी कविताएं जहां प्रेम रस में पगी होती हैं तो वहीं प्रतिरोध के स्वर भी स्पष्ट सुनाई देते हैं. प्रभात कहते हैं कि भले ही इश्क में सब कुछ समर्पण कर दो, लेकिन स्वामिभान पर आंच नहीं आनी चाहिए. एक जगह वे लिखते हैं, “मैं ही क्यों याद करूं उसको, खबर तो मौसम की उसे भी है.”
इंसान के व्यक्तित्व पर उसकी सोहबत का असर जरूर पड़ता है. और अगर सोहबत इश्क-मोहब्बत तथा दयालुता में घुली हो तो असर दूर तलक तथा देर तलक रहता है. इस पर प्रभात पांडेय लिखते हैं- “सीख कर गया है वो मोहब्बत मुझसे जिस से भी करेगा बेमिसाल करेगा.”
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किताब-ए-मोहब्बत
किताब-ए-मोहब्बत जब भी तुम लिखना
दास्तां-ए-बेवफ़ाई भी एक पन्ना रखना
कुछ लफ़्ज मेरी वफा के होंगे
कुछ बातें बेवफाई के भी रखना!!
खतों के वो काले स्याह हर्फ लिखना
सूखे गुलाबों की ख़ुश्बूएं भी रखना
अब ना जाने की वो जिद भी होंगी
फिर लौट आने के इरादे भी रखना!!
बागों में किए वो वादे भी लिखना
चाँद-सितारों से कही बातें भी रखना
दुआओं में माँगी मुरादें भी होंगी
पेड़ों पर बांधे वो धागे भी रखना!!
झुकी पलकों के इशारे भी लिखना
सुर्ख होंठों की वो नरमी भी रखना
तेरे गेसुओं की घनी छाँव भी होंगी
धड़कनों पर वो इत्मिनान भी रखना!!
शिकारों पर गुजरी शामें भी लिखना
तेरे दामन में रोशन वो सहर भी रखना
हिज्र के उन दिनों की बातें भी होंगी
तेरे पहलू में गुजरी वो रातें भी रखना!!
कुछ आरजू-ए-जिंदगी भी होंगी तुम्हारी
कुछ मिन्नत-ए-मोहब्बत मेरी भी रखना
किताब-ए-मोहब्बत जब भी तुम लिखना
दास्ताँ-ए-बेवफाई भी एक पन्ना रखना!!
मेरी याद
ये तकिए पर फैली नमी
ये लिहाफ पर दर्ज निशाँ
पायतानों के सिमटे ये चादर
कहते हैं,
कल की रात उठा था कोई ज्वार
ये आँखों के गीले कोर
ये अलसायी सी पलकें
चेहरे का ये सूनापन
कहते हैं,
कल की रात आया था कोई सैलाब
ये उलझे गेसुओं के जाल
ये पलकों तले काले निशाँ
अधरों पर फैली ये अधूरी मुस्कान
कहते हैं,
कल की रात निकला था कोई ग़ुबार
ये कमरे की खामोशी
ये कदमों की थकान
फ़िजा में ये अधूरी सी खुश्बू
कहते हैं,
कल की रात हुआ था कुछ बरसों के बाद
ये लटों में उंगलियां फिराना
ये अधखुले होंठों से बुदबुदाना
मिलती नजरों से ये गर्दन झुकाना
कहते हैं,
कल की रात आई थी फिर मेरी याद!!
खंजर
खंजर है या नजर तेरी
फर्क़ सिर्फ इतना है
खंजर क़ुर्बानी लेता है
तेरी नजर पर क़ुर्बां हो जाते हैं!!
खंजर की क्या बिसात
जो कतरा भी चूम ले लहू का
वो तो तेरी नजर ही है
जिधर फेर दे, दरिया बह जाए!!
सुना था खंजर से होती है क़ुर्बानी
आज नजर ही नजर में क़ुर्बां हो गए!!
नजर इश्क की हो ये जरूरी नहीं
मगर, घाव दिल पर लगे
इसलिए वार खंजर सा चाहिए!!
जख्म खंजर का हो या नजर का हो
भरने के लिए मरहम इश्क का चाहिए !!
सुना था वो कातिल है, खंजर लिये घूमता है
हम तो कत्ल होने की नजर लिये बैठे हैं!!
अदावत कर खंजर से बच भी जाएं गर
हम, नजरों से अदावत कर कहां जाएंगे!!
ये तो तेरी नजर है कि अब तलक जिंदा हैं हम
वरना खंजर अपनों के भी खूब चले थे
कहां सलामत हैं हम
कहां सलामत हैं हम!!
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : November 1, 2023, 10:38 IST





