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आज की पीढ़ी की मन:स्थिति को समझना है, तो ज़रूर पढ़ें ‘बंजारे की चिट्ठियां’

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जब विचारों की दौड़ लगती है, तब शब्द आज़ाद परिंदों की तरह अपनी बनी-बनाई तमाम बंदिशों को तोड़ देना चाहते हैं. ‘बंजारे की चिट्ठियां’ पढ़ते हुए सचमुच ऐसा लगता है, कि किसी की डायरी चोरी से हाथ लग गई है और इससे पहले कि उसे पता चले (जिसकी डायरी हाथ लगी है) डायरी को पूरा पढ़कर कर खामोशी से वापिस उसके तकिए के नीचे रख दिया जाए. ‘बंजारे की चिट्ठियां’ लिखने वाले युवा लेखक सुमेर सिंह राठौड़ रेत के समंदर और अंधड़ में खेलकर बड़े हुए हैं. अपनी रचनात्मक यात्रा में भी वे उसी खिलाड़ी जज्बे से आगे बढ़ते दिखाई देते हैं. किताब को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि जहां शब्द साथ नहीं होते, वहां सुमेर दृश्यों के माध्यम से अपनी बात कह जाते हैं.

चाह-बिछोह, लाग-लपेट, सफलता-सार्थकता, विफलता-कशमकश… यानी कि जीवन में जो कुछ भी होता है, वह सुमेर के लेखन और उनकी किताब में पढ़ने को मिलता है. ‘बंजारे की चिट्ठियां’ खुरदुरी ज़िंदगी का एक बेहद कोमल आख्यान है, जिसे पढ़ना अपने किसी-न-किसी अक्स को देखने जैसा है. किताब आईने की तरह है, जैसे किसी ने वह लिख दिया हो, जो हमने भी भोगा या महसूस किया… या फिर कहीं कुछ ऐसा जिसके लिए शब्द नहीं थे, लेकिन खयाल तो नजाने कब से अपनी बारी के इंतज़ार में था.

सुमेर ने भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. थोड़े समय पत्रकारिता में भी सक्रिय रहे और फिर बाद में राजकमल प्रकाशन के साथ जुड़कर सोशल मीडिया एडिटर के तौर पर लंबा वक्त बिताया. लेखन के अलावा, कैमरा उनकी पहली पसंद है, वही उनकी दुनिया है. इन दिनों सुमेर जैसलमेर-दिल्ली-मुंबई तीनों शहरों से ताल्लुक रखते हैं, इन्हीं शहरों की किसी गली, किसी मकान, किसी दुकान या किसी किनारे अपनी डॉक्युमेंट्री फिल्मों पर काम करते हुए मिल जाएंगे.

‘बंजारे की चिट्ठियां’ के बारे में सुमेर लिखते हैं, “चुप्पियों के कितने सारे डर थे, जिनसे लड़ने के लिए ये चिट्ठियां लिखी गईं. लोगों के लिए नहीं, अपने ही लिए खुली. डायरी कहते हैं जिसे. बिना लिफ़ाफों और बिन पते वाली ‘आत्मा’ को लिखी चिट्ठियां डायरी बन जाती हैं शायद…” वह आगे लिखते हैं, “डर- पुराने-नए, छुपे ज़ाहिर, सारे डर चिट्ठियों के किताब बनने के रास्ते में मेरे सिर पर सवार हो गए थे. यह किताब ‘किताब’ सोचकर नहीं लिखी गई. बस, यह लिखी जा रही थी. पन्ने लिखे जा रहे थे. उनके लिखे जाने और छपने के बीच की दुनिया का हिसाब कर रहा हूं, तो कितने सारे चेहरे आंखों के आगे घूम रहे हैं. मुझे किताबों, तस्वीरों, फिल्मों की इस नई दुनिया में रास्ता दिखाने वाले कितने सारे लोग थे जो अब ग़ायब हो गए हैं. कितने सारे सपने थे जो सच हो गए, लेकिन अपनी कीमत लेकर.”

सुमेर लिखते हैं, “हम इस शताब्दी में पहली पीढ़ी हैं. जीवन के दो दशक खत्म होने के बाद इसमें दाखिल हुए हैं. हमारे पास न चम्मच है, न झोले. इस दुनिया में बचे रहने के लिए रोज़ लड़ना है- खुद से भी, दुनिया से भी. वरना ख़ारिज़ हो जाएंगे ज़माने से… ऊपरी तौर पर देखें तो ज़माने में कितना प्यार है, लगाव की कितनी बातें हैं… ठहरकर हवाओं को महसूस करें तो कितनी चुप्पियां हैं, कितनी दूरियां हैं. इसी के बीच खड़े होना समय है. अपना समय… चिट्ठियां जो खुद को भेजनी थीं, अपने डरों से लड़ने की कोशिश में, ‘बंजारे की चिट्ठियां’ बन गईं, यह दुनिया से न कही जा सकी बातों की लिखी हुई डायरी है.”

Banjare ki Chitthiyaan Sumer Singh Rathor

बंजारे की चिट्ठियां : सुमेर सिंह राठौड़

ज़िंदगी के पच्चीस बरस पूरे हो जाने पर एक दिन बंजारे को अचानक महसूस हुआ कि उसे अब अपने बीते हुए जीवन का लेखा-जोखा करना चाहिए. सारी दुनिया को पीछे छोड़ कोसों दूर एक तालाब किनारे बैठकर उसने जीवन का रिवाइंड बटन दबा दिया. अपने झोले में से उपहार में पाई एक मुड़ी-तुड़ी कोरी डायरी निकालकर लिखना शुरू किया बीत चुके जीवन को. पहले पन्ने पर जीवन के बीच के दिनों की एक याद लिखी… लिखा- बंजारे ने उस दिन मसान से निकलते हुए लोगों को देखा. उनकी देखादेखी कैर की सूखी टहनियां पीछे की ओर फेंक दीं और हरे पत्ते आगे की ओर. कुएं के पानी से बंजारे ने धो दिया अपना मसणिया वैराग.

प्रस्तुत हैं ‘बंजारे की चिट्ठियां’ से कुछ चुनिंदा अंश-

पृष्ठ 92
“मोर दो लोगों के बंध जाने का साक्षी था. बंध जाने का मतलब था, दो लोगों के हिये एक हो जाना. कितने सारे रंग हैं, दो लोगों के एक होने में. मुझे शादी वाल ‘सिस्टम’ कभी समझ में आया ही नहीं. गांवों में किसी की भी शादी के वक्त की जितनी भी रस्में देखीं, उनमें बहुत सारे रंग हैं, और वो रंग सबको दिखते हैं. लेकिन वहां फिर भी सबकुछ छिपा हुआ था. वे रंग बस कल्पनाओं में सोचे जा सकते थे, हक़ीकत में उन्हें समाज ने वर्जित कर रखा था.

मैं छत पर टहलते मोर को हर रोज़ देखता हूं और सोचता हूं कि कभी भी रिश्तों की डोर में अहम की गांठें नहीं पड़ने दूंगा. उस डोर में टांगूंगा उस नासेटू के काते हुए प्रेम के कोइए; बस.”

पृष्ठ 94
“दोपहरें जलते हुए राख हो जातीं शाम के इंतज़ार में. शाम जैसे कि शहर की पुरानी इमारतें छांव का पीछा करते-करते डूब गई हों किसी एंटीक से चाय के प्याले में. और फिर कम होती चाय के साथ डूबते जाएं आप कहानियों में. कहानियां जीवन की की, शहर की, बनने और बिगड़ने की, चुपचाप सुनने की, दूर तक चले जाने की, झूठ से भरे लोगों के सच ओढ़ने की कहानियां! और इन कहानियों को सुनते हुए हटता जाता जीने की राहों पर छाया धुंधलका. और लगता जैसे दोपहर में चारों ओर उग आए हों घने छांव वाले दरख़्त.”

पृष्ठ 113
“चुप्पियों के सिरहाने रखी बोतलों में भरी रहती हैं आदासियां. आसपास बिखरे मोरपंख पूछते हैं सवाल. काश कि श्रापित लोग भी दे सकते श्राप, उन्होंने जो रट रखा है कि जितनी नफ़रत तुमको खुश रहने से है, उससे दोगुना बहाने हों खुश रहने के. यों भी कोई जुल्म करता होगा क्या? एक दिनमैं ढूंढ लूंगा श्राप की काट किसी आत्मा की छांव में. और चेहरों पर बिखने लगेगा भौचक्क देखते तारों का नूर.”

पृष्ठ 121
“पांवों के किनारों पर कसती पट्टियों को देखकर सड़क किनारे बिछ गई थीं जो आंखें, नशे में देखे जाने पर झेंप गई थीं जो आंखें, दुआ मांगते हुए पोरों को नम कर गईं जो आंखें, देर की चुप्पियों पर आसमान में खो गईं जो आंखें, खुद को ढूंढ रही हैं वो आंखें…

वो आंखें कहती हैं, कुछ भी मत देखों कि ठहर गई हैं आंखें… कितनी चुप्पियां हैं… सोने और पढ़ने के बहाने होते तो ये आंखें होती ही नहीं…”

पृष्ठ 130
“कई बार हम ख़ुद के बनाए हुए दिमागी जंजालों में इतने खोए होते हैं, कि थोड़ा-सा भी कुरेदे जाने पर रेत की तरह भसककर बह जाते हैं. हम वह सब उगल देते हैं जो दिनों से हमारे हिये को दीमक की तरह चाट रहा होता है. और तब कितना बुरा होता है, जब कुरेदने वाला हमारे सच अख़बार बना कर बांट दे. वह सच जिसे सिर्फ हम ख़ुद समझ सकते थे, जो दुनिया के लिए असहनीय व संस्कृति को डुबा देने वाले सच थे, राहों पर चलते हुए ऐसे लगता है जैसे लोगों की नज़रों में अजूबा हो गए हों हम. कितना बुरा था, हर निगाह का सवाल हमारी ओर उठ आना. अब कोई यह कहता कि हम इतने चुप क्यों हैं तो हम अपने ही कांधे पर सर रखकर रोने लगते.

कंधे बन जाना या कंधे बनाना इस दुनिया का सबसे बड़ा धोखा था.”

पुस्तक : बंजारे की चिट्ठियां
लेखक : सुमेर सिंह राठौड़
प्रकाशक : सार्थक (राजकमल प्रकाशन का उपक्रम)
मूल्य : 199 रुपए

Tags: Book, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature, Motivational Story

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Gypsy News
Author: Gypsy News

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